संविधान और क़ानून को ताक पर रख कब तक होंगी केरल में नृशंस हत्याएं ?

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भारत में लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था है, लेकिन फिर भी केरल में दशकों से जारी संघ कार्यकर्ताओं की हत्या पर लगाम नहीं लग पा रही है यह सोचने का विषय है। जब केरल में कुछ लोगों की हत्या केवल इसलिए कि जाती है कि वह किसी ख़ास संगठन से जुड़े है या कई बार ऐसा होता है कि मात्र शक के आधार पर हत्या कर दी जाती है, तो उस समय देश का बहुसंख्यक समाज और मीडिया जगत केवल मूकदर्शक क्यों होता है ? ये सोचनीय विषय है।

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न्यायपालिका से लेकर सरकारें 1969 से लेकर अब तक इन सैकड़ों मामलों पर सख्त संज्ञान नहीं ले पायीं ? केरल में 1969 से लेकर अब तक लगभग 300 से अधिक संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या हुई जिनमें  228 केवल वामपंथी हिंसा के शिकार हुए। 28 दिसंबर 2016 को राधाकृष्णन को परिवार समेत जिन्दा जलाने की कोशिश से लेकर विगत 12 मई 2017 को बीजू की गला काटकर हत्या तक में देश की अधिकांश संस्थाएं मौन क्यों है? इसका जवाब ढूंढना ही होगा अन्यथा यह स्थिति गंभीर समस्या बनेगी और उस समय तक शायद देर हो चुकी होगी इतिहास में पंजाब और कश्मीर इसका उदाहरण है।

— उमाशंकर, खोड़ा कॉलोनी, साहिबाबाद, गाजियाबाद

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